Saturday, June 1, 2013

9 BEAUTIFUL MESSAGES...

9 BEAUTIFUL MESSAGES...

1) stay away from anger...
It hurts...Only You!

2) If you are right then there is no need to get angry, 
and if you are wrong then you don't have any right
to get angry.

3) Patience with family is love, 
Patience with others is respect.
Patience with self is confidence and Patience with
GOD is faith.

4) Never think hard about the PAST, It brings tears...
Don't think more about the FUTURE, It brings fears...
Live this moment with a smile,
It brings cheers

5) Every test in our life makes us bitter or better,
Every problem comes to make us or break us,
The choice is ours whether we become victims or
victorious

6) Beautiful things are not always good but good
things are always beautiful

7) Do you know why God created gaps between
fingers?
So that someone who is special to you comes and fills
those gaps by holding your hand forever

8)Happiness keeps you sweet so try n be as happy
from within as possible

9)God has send us all in pairs...someone ¬¬...somewhere is
made for u...so wait
for the right time n right moment..

देश गान

देश गान
















मन समर्पित, तन समर्पित
और यह जीवन समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं

माँ तुम्हारा ॠण बहुत है, मैं अकिंचन
किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदन
थाल में लाऊँ सजा कर भाल जब भी
कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण

गान अर्पित, प्राण अर्पित
रक्त का कण कण समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं

मांज दो तलवार, लाओ न देरी
बाँध दो कस कर क़मर पर ढाल मेरी
भाल पर मल दो चरण की धूल थोड़ी
शीश पर आशीष की छाया घनेरी

स्वप्न अर्पित, प्रश्न अर्पित
आयु का क्षण क्षण समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं

तोड़ता हूँ मोह का बन्धन, क्षमा दो
गांव मेर7, द्वार, घर, आंगन क्षमा दो
आज सीधे हाथ में तलवार दे दो
और बायें हाथ में ध्वज को थमा दो

यह सुमन लो, यह चमन लो
नीड़ का त्रण त्रण समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं

बिहारी होने का गर्व--
















बिहारी होने का गर्व--
बिहार - जहाँ सबसे पहले महाजनपद बना!
बिहार - जहा बुद्ध को ज्ञान मिला
बिहार - जहाँ के राजा चन्द्रगुप्त मौर्या से लड़ने की हिम्मत सिकंदर को भी नही हुई
बिहार - जहाँ के राजा महान अशोक ने अरबतक हिंदुस्तान का पताका फहराया
बिहार - जहाँ महर्षि बाल्मीकि, अश्त्रवारका, राजा जनक, राजा जराशंध,पाणिनि(जिसने संश्कृत व्याकरण लिखा), आर्यभट (जिसने पहली बार पता लगाया की सूर्य धरती का चक्कर लगता है ), चाणक्य(महान अर्थशात्री ),कालिदास, तुलसीदास ,रहीम, कबीर का जन्म हुआ !
बिहार - जहाँ के ८० साल के बूढ़े ने अंग्रेजो के दांत खट्टे कर दिए (बाबु वीर कुंवर सिंह )
बिहार - जिसने देश को पहला राष्ट्रपतिदिया
बिहार - जहाँ के गोनू झा के किस्से पुरे हिंदुस्तान में प्रशिद्ध है !
बिहार - जहाँ महान जय प्रकाश नारायण का जन्म हुआ !
जहाँ - स्वामी सहजानंद सरस्वती
राम शरण शर्मा
राज कमल झा
विद्यापति
रामधारी सिंह ‘दिनकर'
रामवृक्ष बेनीपुरी
देवकी नंदन खत्री
इन्द्रदीप सिन्हा
राम करण शर्मा
महामहोपाध्याय पंडित राम अवतार शर्मा
नलिन विलोचन शर्मा
गंगानाथ झा
ताबिश खैर
कलानाथ मिश्र
आचार्य रामलोचन सरन
गोपाल सिंह नेपाली
बिनोद बिहारी वर्मा
आचार्य रामेश्वर झा
राघव शरण शर्मा
नागार्जुन
आचार्य जानकी बल्लभ शाश्त्री
जैसे महान लेखको का जन्म हुआ !
बिहार - जहाँ बिस्स्मिल्लाह खान का जन्म हुआ
बिहार - जहाँ आज भी दिलो में प्रेम बसता है
बिहार - जहाँ आज भी बच्चे अपने माँ - बाप के पैर दबाये बिना नही सोते
बिहार - जहाँ से सबसे ज्यादा बच्चे देश का सबसे कठिन परीक्षा u .p .s .क और IIT पास करते है
बिहार - जहाँ के गो में आज भी दादा दादी अपने बच्चो को कहानिया सुनाते है
बिहार - जहाँ आज भी भूखे रह के अतिथि को खिलाया जाता है
बिहार - जहाँ के बच्चे कोई सुविधा न होते हुए भी देश में सबसे ज्यादा सरकारी नौकरी पते है !
हम इसी बिहार के रहने वाले हैं ! तो काहे न करे खुद के बिहारी होने पर गर्व !जय बिहार !!!

मुझे थोडा सा सत्य दो

एक बार बाऊल के पास एक जिज्ञासु साधक आया.
और कहा : मुझे थोडा सा सत्य दो.’
बाऊल ने कहा : ‘अरे भाई ! अगर तुझे लेना है
तो पुरा सत्य ले.
थोडा सत्य तु बरदास्त नही कर पायेगा.’
साधक : ‘वो कैसे ?’ मुझे साबित कर के बताऔ..
तो बाऊल ने साबित करने के लिए
दो पानी से भरे हुए बडे मटके लिए
और उसके सर पर रखे..
लेकिन साधक वजन सहन नही कर पाया,
तो बाऊल ने वो मटके उतार दिये...
और कहा :‘अब मेरे साथ नदी पर चलो.’ वहा बाऊल
ने को साधक पानी मेँ डुबकी लगाने को कहा..
साधक ने पानी मेँ दो चार डुबकी लगाई और
नदी से बाहर आया...
फिर बाऊल ने कहा : ‘यहा पर उन दो मटको से भी
ज्यादा पानी है
लेकिन तुझे जरा सा भी भार नही लगा...
क्योकि..
पुर्ण सत्य का भार कभी होता नही, लेकिन
उसको अलग थोडा सत्यरुप लेने मेँ आता है
तब भार लगता है .’

महात्मा बुद्ध















एक बार महात्मा बुद्ध रास्ते से गुज़ररहे थे! तभी एक आदमी उन्हें जोर जोर सेगाली देने लगा! महात्मा बुद्ध मुस्कुराए और चुप चाप आगे चल दिए!
ये सब देख कर वो अजनबी आश्चर्य में पड़ गया और महात्मा बुद्ध से पूछा,"मैंने आपको इतनी गालियाँ दी पर आपने कोई प्रतिकार तक नही किया और न ही बदले में मुझसे कुछ कहा!"
महात्मा बुद्ध बोले, "मान लो मैं अभी तुम्हे कुछ सामान दूं और तुम उसे न लो,तो मेरी चीज़ किसके पास रहेगी?"
आदमी बोला, "आपके पास!"
महात्मा बुद्ध हँसे और बोले, "बस ठीक इसी तरह तुमने मुझे गालियाँ दी पर मैंने स्वीकार नही की, तो वो तुम्हारे पास ही रह गयी!"
आदमी महात्मा बुद्ध के पैरो में गिर पड़ा!
इस कहानी का औचित्य बस इतना है कि सामने वाला वही देगा, जो उसके पास है पर हमे सिर्फ उतना ही लेना चाहिए जो हमारे काम का है!

स्वभाव








एक बार एक भला आदमी नदी किनारे बैठा था। तभी उसने देखा एक बिच्छू पानी में गिर गया है। भले आदमी ने जल्दी से बिच्छू को हाथ में उठा लिया। बिच्छू ने उस भले आदमी को डंक मार दिया। बेचारे भले आदमी का हाथ काँपा और बिच्छू पानी में गिर गया।
भले आदमी ने बिच्छू को डूबने से बचाने के लिए दुबारा उठा लिया। बिच्छू ने दुबारा उस भले आदमी को डंक मार दिया। भले आदमी का हाथ दुबारा काँपा और बिच्छू पानी में गिर गया।
भले आदमी ने बिच्छू को डूबने से बचाने के लिए एक बार फिर उठा लिया। वहाँ एक लड़का उस आदमी का बार-बार बिच्छू को पानी से निकालना और बार-बार बिच्छू का डंक मारना देख रहा था। उसने आदमी से कहा, "आपको यह बिच्छू बार-बार डंक मार रहा है फिर भी आप उसे डूबने से क्यों बचाना चाहते हैं?"
भले आदमी ने कहा, "बात यह है बेटा कि बिच्छू का स्वभाव है डंक मारना और मेरा स्वभाव है बचाना। जब बिच्छू एक कीड़ा होते हुए भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ता तो मैं मनुष्य होकर अपना स्वभाव क्यों छोड़ूँ?"
.
.
.
Six ethics of life
Before you pray - Believe
Before you speak - Listen
Before you spend - Earn
Before you write - Think
Before you quit - Try &
Before you die - live !!

आज उसका दिन है...













आज उसका दिन है...

पी. जी. कॉलेज का छोटा सा सेमिनार हाल भरा हुआ था. सम्मान समारोह कम प्रेस कॉन्फ्रेंस जैसा कुछ आर्गनाइज़ किया गया था. आगे की लाईनों में जिले के सारे पत्रकार, उनके फ़ोटोग्राफ़र और कॉलेज के गुरु जी लोग बैठे हुए थे, और पीछे तमाम छात्र-छात्राओं में ठसम-ठस मचा हुआ था. एक ही पंखा था जो चोंए-चोंए कर के चल रहा था, और सारा धकियाना-मुकियाना उसी के नीचे पहुँचने के लिए हो रहा था. 

चर्रर्र...की आवाज़ के साथ सामने डाईस के बगल वाला बड़ा सा दरवाज़ा खुला और उसमे से प्रिसिपल साहब, उनका चपरासी, अशोक गुरु जी और ग्रे पैंट में बाहर लटकी झक सफ़ेद शर्ट पहने एक लड़का अन्दर घुसे. इनके अन्दर आते ही हाल में ख़लबली मच गई. पीछे की भीड़ में से लोग उचक-उचक के देखने के चक्कर में एक-दूसरे का पैर धांगने और देह कचरने लगे.
"बेटा आप लोग आगे आ जाईये..सारी खिड़कियाँ खोल लीजिये और हाँ...इधर...कुर्सियों के बगल में इतनी जगह है तो..." अशोक गुरु जी ने व्यवस्था सम्हालते हुए कहा, तब जा के थोड़ी स्थिति सुधरी.

"मेरी आवाज़ वहाँ...पीछे तक सुनाई दे रही है सबको?" अशोक गुरु जी ने पूछा.
"हाँ सर" ढेर सारी आवाज़ एक साथ आई.
"ठीक है...मैं ये माईक हटा देता हूँ फ़िर...ये हल्ला बहुत करता है." कहकर गुरु जी ने चपरासी से माईक हटवा दिया.
शुरूआती सम्बोधनों और औपचारिकताओं के बाद गुरु जी ने कहा...
"मेरा पत्रकार बन्धुओं से आग्रह है कि वो पहले इस छोटे से सत्र को पूरा सुन लें...उसके बाद भी अगर उनका कोई प्रश्न अनुत्तरित रह गया हो, तो, अलग से समय ले सकते हैं."
थोड़ा गला ठीक करके गुरु जी ने कहना शुरू किया "इसके पहले कि ढेर सारी बातें हों, मैं आप लोगों को एक रात की घटना सुनाता हूँ...तीन साल पहले की बात है. जाड़े की रात थी, और मैं ट्रेन से कहीं से आ रहा था. आपको तो पता ही है, हमारे यहाँ कितनी भीड़ होती है स्टेशन पे...और जाड़े की रात हो तो पूछना ही क्या...है ना ?"
"हा-हा-हा-हा..." हाल में हँसी तैर गई.
"तो कुल मिला के दो-एक लोग ही थे स्टेशन पे. मैं स्टेशन से बाहर आया. अभी रिक्शा ख़ोज ही रहा था, कि एक लड़का मेरे पास आया. उसने झुक के मेरा पैर छुआ और बोला - लाइए गुरु जी अपना सामान मुझे दीजिए. अब मैं बड़ा हैरान हुआ कि भाई रात के डेढ़ बजे ऐसे पाले में...ये कौन है..? दिमाग में पचासों सवाल. मैंने भी सोचा कि है ही क्या मेरे पास कि बेवजह परेशान रहूँ? मैंने भी दे दिया कि लो भाई. फ़िर उसने मुझे एक रिक्शे पे बिठाया और ख़ुद जब रिक्शे वाले की जगह बैठ के रिक्शा ले के चल पड़ा तो मैं हडबडाया...
पूछा - अरे भाई...ये किसका रिक्शा उठा के चल दिए तुम? और रिक्शा वाला कहाँ है?
वो मुस्कुरा के बोला - गुरु जी मेरा ही रिक्शा है ये.
मैंने पूछा - तुम रिक्शा चलाते हो?
उसने कहा - जी गुरु जी.
मैंने पूछा - और मुझे कैसे जानते हो?
तब उसने कहा - गुरु जी आपकी इतिहास की फस्ट ईयर की क्लास में हूँ मैं. मुझे तो एक बारकी यकीन ही नहीं हुआ कि ये सच है.
फ़िर मैंने उससे पूछा - कभी क्लास भी आते हो?
उसने कहा - जी गुरु जी रोज़ आता हूँ.
अब मैं हैरान कि ये रोज़ क्लास भी करता है, रोज़ रिक्शा भी चलाता है. मैंने सोचा ये झूठ बोल रहा है.
मैंने फ़िर पूछा - परसों भी आए थे?
उसने कहा - जी गुरु जी.
मैंने चट से पूछा - अच्छा तो बताओ मैंने क्या पढ़ाया था?
उसके बाद जो उसने कहा उस उत्तर ने मुझे चौंका दिया.
उसने कहा - गुरु जी आप उत्तर वैदिक काल के ऐतिहासिक स्रोतों की चर्चा पर ही रुक गए थे, वहीँ से कल की क्लास में पढ़ाना है.
मैं "हूँ" बोल के सोचने लगा कि जिस लड़के ने मेरे पढ़ाने से पहले ही प्राचीन भारतीय इतिहास का काल विभाजन पढ़ लिया हो उससे मैं और क्या पूछूँ !
खैर मेरी जिज्ञासा बढ़ी और मैंने उससे पूछा - भाई एक बात बताओ, तुम रोज़ रिक्शा चलाते हो?
वो बोला - जी गुरु जी.
मैंने पूछा - रोज़ रात में?
उसने कहा - जी गुरु जी.
फ़िर तुम सोते कब हो? - मैंने पूछा.
उसने कहा - सो कर ही आ रहा हूँ गुरु जी. दोपहर तीन बजे जब कॉलेज ख़त्म हो जाता है तो घर जाकर सो जाता हूँ, फ़िर शाम को साढ़े सात बजे उठता हूँ और सत्तू पी के स्टेशन आ जाता हूँ, क्यूँकि शाम वाली सारी गाड़ियों का वक़्त हो जाता है. फ़िर नौ-साढ़े नौ तक वापस चला जाता हूँ, और खाना खा के सो जाता हूँ. फ़िर एक-डेढ़ बजे तक वापस आ जाता हूँ और अभी आने वाली एक-दो ट्रेन निपटा के वापस घर चला जाता हूँ.
मैं अवाक रह गया.
मैंने पूछा - फ़िर तुम पढ़ते कब हो?
वो बोला - अभी की शिफ्ट निपटा के तीन बजे तक मैं घर चला जाऊँगा, फ़िर सुबह सात-आठ बजे तक पढूँगा. फ़िर खाना खा के नौ-दस बजे तक कॉलेज.
मेरा इतना कहकर चुप हो जाना ही पर्याप्त है, पर नहीं, क्यूँकि असल बात अब शुरू होती है. मैंने घर पहुँचकर जब उसे पैसा देना चाहा तो उसने मना कर दिया.
मैं समझता हूँ, क्यूँकि मैं भी अपने गुरु जी से नहीं ले पाता. पर उसने मुझसे जो माँगा, वो मैंने भी अपने गुरु जी से कभी नहीं माँगा.
उसने कहा - गुरु जी...लाईब्रेरी के इस्तेमाल के लिए हमारी क्लास को सोमवार का दिन नियत है, और लाइब्रेरी खुलने का समय एक से तीन बजे तक है, जिस समय हम लोगों की क्लास चलती रहती है...और किताबों की संख्या भी कम है. जिससे बड़ी समस्या होती है. अगर आप कहेंगे तो लाइब्रेरी का समय थोड़ा ठीक हो जाएगा. इससे बड़ी मदद हो जाएगी, गुरु जी.
मैंने कभी सोचा ही नहीं था इस पर. आज जो आप लोग हफ्ते के सातो दिन लाइब्रेरी सुविधा का इस्तेमाल कर रहे हैं, ये प्रेरणा भी उसी की थी और कर्मचारियों की कमी से नपटने का ये अनोखा तरीका, कि, कॉलेज में ही इसके लिए एक स्वयंसेवी समूह की स्थापना की जाय, ये विचार भी उसी का था."

गुरु जी कुछ क्षण शान्त हो गए फ़िर कुछ याद करते हुए बोले - "मैं कभी I.C.S. में चयनित हुआ था. वही जिसे आप सभी आज I.A.S. के नाम से जानते हैं. पर मुझे अन्तिम चयन से पहले इसलिए छांट दिया गया, क्यूँकि मुझे घुड़सवारी नहीं आती थी. फ़िर मैंने ये क्षेत्र चुना, और मैंने ढ़ेरों ऐसे शिक्षक बनाए जिन्होंने देश का भविष्य बनाया और सैंकड़ों I.A.S. देश को दिए. आपके प्रिंसिपल साहब भी मेरे ही एक होनहार शिष्य रहे हैं. एक ज़माने से मैंने किसी बच्चे की व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी नहीं थी. पर उस रात ने मुझे ये हीरा दे दिया. मैंने कभी भी इसे कुछ अलग नहीं पढ़ाया. मैंने इसे वही पढ़ाया जो तुम सब को पढ़ाया. तुमने कभी कुछ पूछा नहीं और मैंने बताया नहीं. इसने पूछा भी, मैंने बताया भी. बस यही फ़र्क रह गया. मैंने इसमें कुछ बहुत ही अच्छे प्रशासकीय गुण देखे और इसे I.A.S. के लिए तैयार करना शुरू कर दिया. आज परिणाम आपके सामने है.

समस्या ये नहीं है कि आज समय बदल गया है या पहले का समय ऐसा था या वैसा था. हर दौर की अपनी कुछ सच्चाई, अपनी कुछ मजबूरियाँ और अपनी ही चुनौतियाँ होती हैं. आप पहले के वक़्त में नहीं थे. उसे हमने अपने तरीक़े से जिया और उससे अपनी तरह से निपटे. हम कल नहीं रहेंगे. कल तुम्हारा है. इसे अपनी तरह से निपटो. आदर्शों और प्रतिमानों की आवश्यकता की बातें सब बेमानी हैं. जिन आदर्शों की बातें की जाती हैं, उनके सामने कौन से आदर्श थे...और उनके सामने...और उनके भी सामने? तो सच्चाई यही है, कि, जब भीतर आग लगी होगी तो तुम पानी ख़ुद ही ख़ोज लोगे.

"...चलो ये सब बातें तो हमारे-तुम्हारे बीच क्लास में भी हो जाएँगी. आज उसका दिन है...उसे ही सुनो..." कह कर जैसे ही अशोक गुरु जी ने उसका नाम पुकारा हाल तालियों की ज़बरदस्त तड़तड़ाहट से गूँज उठा. वो मुस्कुराता हुआ उठा. गुरु जी के पैर छुए, और सामने आकर खड़ा हो गया. बार-बार कुछ बोलने को होता और फ़िर सबकी ओर मुस्कुराता हुआ देखकर शर्माकर वापस गुरु जी की ओर देखने लगता...आख़िर तालियाँ रुकें तब ना !

- अजय आनन्द

Via : The Weekend